आप जब भी 'सच' बोलते हैं
मेरी उँगलियाँ थरथराने लगती हैं
भिंच जाती है मेरी मुट्ठी
आप भी, न जाने क्यों, मुझे दिखने लगते है
पगुराती भैंस
जब भी आप सच बोलते हैं।
नेता जी , मुझे माफ़ करें
आपकी बातें बहुत ध्यान से सुनता रहा हूँ बरसों
करता रहा यकीन
कि आप जनता के शुभ चिन्तक हैं
आप चाहते हैं अपने राष्ट्र का हित
मानता रहा कि आप जनता के सेवक हैं
लेकिन कब तक करता रहता आपकी नौटंकी पर विश्वास
आपसे अच्छी और मजेदार तमाशा तो फ़िल्मी नचनिया दिखाते हैं
हमने आपको नचनिया नहीं
कर्मनिष्ठ महापुरुष माना था
आप निकले सत्यवादी नौटंकीबाज
लिंग, वय, वेशभूषा और भंगिमा वगैरह में तो हुए परिवर्तन
किन्तु नहीं बदली तो आपकी नीयत
जिसमे खोट तब भी थी , आज भी है
और हम लोकतंत्र की मर्यादा से लिथड़े
लोकतंत्र के लोग
निगलते है देखकर भी मक्खियाँ
आप जब भी सच बोलते हैं
उन शब्दों से निकलती है बदबू
अक्सर मुश्किल हो जाता है साँस लेना
आपके धवल वस्त्रों से
आपकी आँखों से
आपकी प्रकम्पित जबान से
बंधा चला करता है लोकतंत्र का स्थावर
आप जब सच बोलते हैं
हमारा ह्रदय रोता है
नेताजी माफ़ करें
कम से कम से एक चुनाव में आप आराम करें।
Saturday, January 30, 2010
जब आप 'सच' बोलते हैं
प्रस्तुतकर्ता रवीन्द्र दास पर 7:56 PM 0 टिप्पणियाँ
Sunday, January 24, 2010
प्रेम का गोपनीय
उन दोनों ने
तय पाया है कि वे प्रेम 'करते' हैं।
तय किया कि शादी करेंगे
यानि
दो प्रेम करने वाले शादी करेंगे।
क्योंकि जरूरी है
जीवन भर के सम्बन्ध के लिए।
और सम्बन्ध
जरूरी है प्रेम के लिए।
प्रेम संबंधों का एक प्रकार है।
शादी से सम्बन्ध तय होता है।
हालाँकि दोनों इस बात पर भी सहमत हैं कि
प्रेम करना
और शादी करना - एकदम अलग-अलग घटनाएँ हैं
फिर , सवाल है कि
प्रेम करना शादी करने की तैयारी है ?
या शादी करना प्रेम करने की तैयारी है ?
शादी का एक निश्चित तरीका है
प्रयोजन और सार्थकता भी
किन्तु प्रेम का ?
असमंजस है , फिर भी वे तय हैं
शादी करेंगे
क्योंकि प्रेम करते हैं
लगता है ऐसा
कि शादी न करने में
प्रेम न करने का कोई गोपनीय छुपा है। ( ०९-६-२००३ )
प्रस्तुतकर्ता रवीन्द्र दास पर 8:18 PM 1 टिप्पणियाँ
Thursday, January 21, 2010
यह कविता नहीं, सच का बयान है
अकड़ रहे थे हाथ - पैर
मुँह से निकल रहा भाप
थरथरा रहा था सारा बदन
फिर भी कहीं जाना था अनिवार्य
सो चला जा रहा था यूँ ही अकेले मलते हुए हथेलियों को
और लोग भी आ-जा रहे थे
फिर भी पसरी थी वीरानी
कोई ठहरता न था मेरी आँखों में
मैं चला जा रहा था लरजते क़दमों से
यूँ ही कुछ सोचना था
तो सोच रहा था तुम्हे
सच बताऊँ तो तुम्हे सोचना जितना दुःख देता है
उससे कम सुकून भी नहीं देता
गुजर गए दस साल
लेकिन सांसों की तरह बनी रही तुम्हारी याद
यूँ कि बगैर उसके तो मैं था ही नहीं
चला जा रहा था मैं
कि कोहरे से लिपटी तुम्हारी काया
वैसे ही खुले हुए तुम्हारे बाल,
सब्ज साडी के ऊपर काला लम्बा कोट
तुम्हारा दिख जाना
शिशिर की हड्डी में चुभने वाली ढंड में गर्म धूप का अहसास ही तो था
नहीं हो पा रहा था यकीन
भूल गया था कि मुझे जाना कहाँ है ?
मचल उठा था मैं
शायद तुमने देखा नहीं
कैसे उस स्कूटर से टकराते -टकराते बचा था मैं
स्कूटर वाले की बदतमीजी मुझे दुआ सी लग रही थी
थोडा सा भर गया तुम्हारा बदन
हाँ हाँ ! तुम्ही थे
तभी तो मेरे पुकारने पर ' नेहा '
तुमने देखा था पलटकर
मैं भूल गया था सर्दी , कोहरा ,.... सब कुछ
देखो ! फिर मत कह देना कि मैं कविता कर रहा हूँ
नहीं , नहीं, यह कविता कतई नहीं
यह तो मेरे तजुर्बे का बयान है।
प्रस्तुतकर्ता रवीन्द्र दास पर 7:00 AM 0 टिप्पणियाँ
Saturday, January 16, 2010
जन्म-दिन के दिन
मैं अपने जन्म-दिन के दिन सोचता हूँ
कि कोई अपने जन्म-दिन पर खुश कैसे हो पाता है ?
मैं अपने जन्म-दिन के दिन
खुश होने की कोशिश करना भूल जाता हूँ।
फिर भी मैं सोचता हूँ
कि किसी के जन्म-दिन, मसलन , गाँधी या ईसा के जन्मदिन पर
छुट्टी क्यों होती है?
किसकी और किससे होती है ?
और सोचता हूँ
कि जन्म लेना ख़ुशी की बात है या दुःख की बात !
हालाँकि यह सोचना अच्छानहीं लगता
फिर भी सोचता हूँ कि
जन्म लिया जाता है
या जन्म दिया जाता है ?
साथ में मैं यह भी सोचता हूँ
कि जन्म लेना ख़ुशी की बात है
या जन्म दिन मनाना ख़ुशी की बात ।
सच बताऊँ तो मैं सोचता नहीं
बस जानना चाहता हूँ
कि ख़ुशी का कोई कारण होता है
या यहाँ भी सिर्फ मनमानी है।
प्रस्तुतकर्ता रवीन्द्र दास पर 1:14 AM 0 टिप्पणियाँ
