Monday, April 13, 2009

मुहब्बत की खुमारी

नहीं फितरत हमारी है कि हम
फकत बकवास करते हों
नहीं बेबस भी है इतने कि आकर दुम हिलाएंगे
अभी जो मुस्कुराता आपकी आँखों में झांके हूँ
महज इक चांदमारी है
नहीं समझे?
तो यूँ समझें कि हम कविता के मारे हैं
उसी जालिम ने करके रख दिया
अख़बार बासी सा
अरे कैसे बताऊँ ये
मुहब्बत की खुमारी है
कि गोया आसमानों में भी दरिया सा दिखे है
मगर अफ़सोस उसमे मैं तुम्हें नहला नहीं सकता
कि उसका रास्ता
जालिम हमारे दिल से जाता है
तुम्हें है सोचना
जाना अगर है आसमान तक जो
वही है स्वर्ग
ज़न्नत भी सभी कहते उसे ही हैं
वहां नीला समंदर है
मुहब्बत की खुमारी है
मुहब्बत की खुमारी है ।

3 comments:

Babli said...

आपने मेरी हर एक शायरी पे इतना सुन्दर कमेन्ट दिया उसके लिये मै आपका आभारी हू !
बहुत ही खुबसूरत लिखा है आपने !

रवीन्द्र दास said...

aankhe khoob surat dekhna janti hain aapki. tabhi to.

Aditiya said...

wonderful,