Saturday, June 27, 2009

रहती थी यहाँ कुछ कविताएँ

रहती थी यहाँ कुछ कविताएँ
वैसे ही ,
जैसे रहती थी दादी की कहानियों में परियां
पिछवाडे वाले कुँए में
और सच्चे-ईमानदार लोगों के लिए जुटाती थी सुख के सामान
वही परियां सज़ा भी देती थी
लालची और मक्कार लोगों को।
कहानी की परियां
जिन्हें हमने कभी देखा नही
लेकिन महसूस किया है बहुत बार
अपनी दादी के निश्छल आगोश में
नासमझ कल्लू के लिए स्वादिष्ट पकवान लाती हुई
कल्लू की उस सूखी रोटियों के बदले ।
उन्हीं परियों की मानिंद कविताएँ
हमारे मानवीय सरोकारों भूखी है बेहद
कभी जब आप बैठेंगे सुस्ताने को
किसी पेड़ के नीचे या कुँए की जगत पर
आ जाएंगी परियां
कविताओं की शक्ल लिये
गोया आपको न भाये उनका रूप
हो गईं हैं पीली और कमजोर
स्नेहिल स्पर्श के अभाव में
बिलखती रहती हैं दिन-रात,
नहीं पहचानी जाती है उनकी शक्ल
तभी तो चल पड़ा है कहने का रिवाज़

कि रहती थीं यहाँ कुछ कविताएँ
वैसे ही जैसे रहती थी जलपरियाँ दादी की कहानियों में।


6 comments:

yuva said...

बेहद मर्मस्पर्शी और झकझोरने वाली रचना जो कविता की वर्तमान दशा भी बताती है. हाशिये पर जाती इस कविता की विधा को कविता के रूप में पेश करने के लिए बधाई. आपके अनुमति से इसे मैं अपने ब्लॉग पर भी लेना चाहूँगा. सधन्यवाद

रवीन्द्र दास said...

kya baat hai! dhanyavad, yuva. kavita sabke liye hai, aap ise apne blog par le. mujhe koi aapatti nahi hai.

sandhyagupta said...

Is prabhavi rachna ke liye badhai.

रवीन्द्र दास said...

Sandhya ji ka dhanyvad.

SULEKHA PANDE said...

कल्पना से परे की है यह ख़ूबसूरत कल्पना ..
अलक्षित रह जाना शायद कुछ रचनाओं की नियति है ..
विडम्बना है ..

पर है ..

लीना मल्होत्रा said...

sundar bhav liye hai kvita.. vaastav me pahle kee khaniyon me naitikta kee seekh hoti thi.. lekin ab pokimon aur shinshan kya sikha rahe hain bachcho ko..