Saturday, May 12, 2012

खिड़की मत बंद करो

सदियों से कह रहा हूँ
कि मत बंद करो खिड़की
खुला रहने दो दरवाजा
कि हर आने-जाने वाला नहीं होता बटमार ही
कि कभी न कभी तो आएगा
तुम्हारी कहानी का किरदार
जो तुम्हें झुलायेगा सपनों की डोर से
कभी तो झांकेगा
तुम्हारे दिल की गहराइयों में
कि भींग जाएगा तुम्हारा अन्तरंग
हृदय हो उठेगा विह्वल
प्रेम से सराबोर होकर तुम
याद करोगे मझे भी
भले ही न देखा हो मुझे आँखें उठाकर
महसूस जरुर किया होगा तुम्हारे दिल ने
मैं सराय का मुसाफिर हूँ
भूल गया है फर्क अपने- परायों का
नहीं बन पाया मैं तुम्हारा 'तुम'
रह गया अन्यपुरुष सर्वनाम
फ़िर भी , ओ मेरे अनाम
मत करो बंद अपनी खिड़की
उसी रस्ते आएगा तुम्हारा सपना ।

3 comments:

Reena Babbar said...

Namaskaar Ravinder Ji , aapse request hai mere is comment ko publish nahi kijiyega, mera aapse ek sawaal hai, aap jo bhi kuch likhte hain kya vo aapki zindagi se hi juda hota hai, i mean life mein aanewaali takleefein, khushiyaan , haadse hi aapki taraf se kavitaaoun mein dhalte hain , ya phir kisi ki pareshaani ko mehsoos kar usey is tarah mehsoos kar ke jaisa vo aapke saath ghatit ho raha tab bhi aap koi kavita likhte hain, kehne ka arth ye hain ke sirf apni peeda ko hi kavita ke roop mein dhaalte hain ya kisi aur ki bhi peeda ko vaisa bayaan kar paate hain, ek kavi kya sochta hai ye jaanna chahti hoon isliye poochne ka man hua

रवीन्द्र दास said...

ये आपको कैसे पता चला कि मैंने उसे सार्वजनिक किया था ! खैर ! कविता कोई रिपोर्ट तो है .. कई अनुभूतियों .. स्थितियों ... विमर्शों ... और मंथन के बाद फूटती हैं कविताएँ .. कब क्या कहाँ कैसे का कोई ऐतिहासिक विवरण नहीं होता .. इस पर तो बहुत कुछ कहा जा सकता है .. आप की जिज्ञासा के लिए शुक्रिया रीना जी !!

Reena Babbar said...

uttar ke liye bahut bahut shukriya ...