नंगी औरत
भाग रही है बदहवास
सरे-बाज़ार
बाजारू लोग तैयार न थे इस करिश्मे के लिए ।
ठगे-से लोग
भौचक्के हैं कि इतनी खुबसूरत नग्न -काया
जीवित, गतिशील थिरकती हुई
देखने को इस तरह मिल जाएगी
सपने में भी सोचा न था।
माशा अल्लाह ! क्या कटाव है!
सबकी आंखो से झांकने लगा वहशी मर्द
किसी को ये फ़िक्र न हुई
कि वह गरीब
किस बेबसी में लाचार हुई नंगे-बदन
सरे-बाज़ार.......
सबने देखा तराशा बदन सबने देखा
उसके नितम्बों की थिरकन
किसीने न देखी उसकी बेबसी
किसी ने न देखा
उसका चीरहरण करने वाले दुह्शासन को
भले ही
बाद में होने वाले कान्फरंस में भीष्म की तरह
जताए अपनी लाचारी
करे अफ़सोस मानवता के पतन पर .......
अभी भी भाग रही होगी कोई
नंगी औरत
इज्ज़त की परवाह किए बगैर
जीने की खातिर ।
Tuesday, March 24, 2009
Tuesday, March 3, 2009
चेहरे में कोई सपना
तुम्हारे चेहरे में कोई सपना था
जिसे बरसो-बरस मैंने देखा किया
तुमने तो हर बार मेरा पागलपन कहा
पर, मैं बता दूँ साफ-साफ
कि कोई और सच होता नहीं इतना खुबसूरत
जिसे छू सकूँ
और जी सकूँ अपनी आजाद सांसों के साथ ...
ओ मेरे सपने का सच!
और क्या होता है प्यार?
ख्वाहिश के बगैर है जो जिंदगी
जहाँ न सपना है ,न तुम हो
उस जिन्दगी से भी मेरी तौबा है
जहाँ तुम्हारा चेहरा नहीं
मेरी साँसे, तुम्हारा चेहरा
और चेहरे से टपकता वो सपनो का नूर
मैं आज फ़ना हो जाऊँ
तो क़यामत तक खुशहाल रहूँगा
लेकिन,
वो इस तासीर को क्या खाक महसूस करेगा
जिसके नसीब में जन्नत के लिए भी किश्त भरना है
गोया कब आ जाए अफगान
वसूल करने अपना बकाया .......
क्यों नहीं ठहर जाता है वक्त
क्यों नहीं पत्थर हो जाता हूँ मैं
तुम्हारे चेहरे के आब से
भीगा देना मुझको
जो मैं हो गया पत्थर तुम्हारे प्यार में ।
जिसे बरसो-बरस मैंने देखा किया
तुमने तो हर बार मेरा पागलपन कहा
पर, मैं बता दूँ साफ-साफ
कि कोई और सच होता नहीं इतना खुबसूरत
जिसे छू सकूँ
और जी सकूँ अपनी आजाद सांसों के साथ ...
ओ मेरे सपने का सच!
और क्या होता है प्यार?
ख्वाहिश के बगैर है जो जिंदगी
जहाँ न सपना है ,न तुम हो
उस जिन्दगी से भी मेरी तौबा है
जहाँ तुम्हारा चेहरा नहीं
मेरी साँसे, तुम्हारा चेहरा
और चेहरे से टपकता वो सपनो का नूर
मैं आज फ़ना हो जाऊँ
तो क़यामत तक खुशहाल रहूँगा
लेकिन,
वो इस तासीर को क्या खाक महसूस करेगा
जिसके नसीब में जन्नत के लिए भी किश्त भरना है
गोया कब आ जाए अफगान
वसूल करने अपना बकाया .......
क्यों नहीं ठहर जाता है वक्त
क्यों नहीं पत्थर हो जाता हूँ मैं
तुम्हारे चेहरे के आब से
भीगा देना मुझको
जो मैं हो गया पत्थर तुम्हारे प्यार में ।
Monday, March 2, 2009
मुझे अहसास हो रहा है अब
मुझे अहसास हो रहा है अब
कई वर्षों के बाद
कि मैं वंचित रह गया था तुम्हारे प्यार से ।
इसलिए नहीं कि मैं अपात्र था
इसलिए भी नहीं
कि तुम्हारे ह्रदय-साम्राज्य पर
कोई अन्य काबिज था
तुम कोई डरपोक या दकियानूसी भी नहीं थे
बात बहुत छोटी थी
जनता हूँ ,
जो भी सुनेगा , हंसेगा
मैं नादान नहीं था
न ही असमर्थ या कायर ही था
फिर भी जानता नहीं था मैं
कि मुझे करना क्या था !
मुझे याद है आज भी
तुम्हारी वो बेवसी
जो मेरी किंकर्तव्य-विमूढ़ता से
कई दिनों तक तैरती रही थी तुम्हारी आंखों में ।
कई वर्षों के बाद
कि मैं वंचित रह गया था तुम्हारे प्यार से ।
इसलिए नहीं कि मैं अपात्र था
इसलिए भी नहीं
कि तुम्हारे ह्रदय-साम्राज्य पर
कोई अन्य काबिज था
तुम कोई डरपोक या दकियानूसी भी नहीं थे
बात बहुत छोटी थी
जनता हूँ ,
जो भी सुनेगा , हंसेगा
मैं नादान नहीं था
न ही असमर्थ या कायर ही था
फिर भी जानता नहीं था मैं
कि मुझे करना क्या था !
मुझे याद है आज भी
तुम्हारी वो बेवसी
जो मेरी किंकर्तव्य-विमूढ़ता से
कई दिनों तक तैरती रही थी तुम्हारी आंखों में ।
Subscribe to:
Posts (Atom)