Monday, April 5, 2010

अन्धा कुआं है यह कोशिश

मैं जानता हूँ
अन्धा कुआँ है यह कोशिश
तुम्हारी ओर आने की
मैं जानता हूँ
मिटा दिया है तुमने मेरे नाम
हर उस जगह से
जहाँ भी फैल सकता है तुम्हारा विस्तार
मैं जानता हूँ यह भी
कि बस एक भूले हुए नाम से अधिक कुछ भी नहीं है
तुम्हारे लिए मेरा वजूद
बड़ी मेहनत से रची हुई अल्पना को जैसे
किसी शैतान बच्चे ने उजाड़ दिया हो
वैसे ही तो उजड़ गई है मेरी जिन्दगी
और शायद तुम्हारी भी
किन्तु शेष है तुम्हारे पास अभी भी
प्रतिशोध की तपिश
नहीं हो पाते होगे एकांत
विरूद्धवाद में होती है बड़ी उत्तेजना
ज़माने ने इसी का तो फायदा उठाया है
खल-नायक तो मैं था
वनवास मिला तुम्हे
आस-पास की हवाओं ने, फजाओं ने
जैसे सराहा हो तुम्हारे इस फैसले को
कुछ-कुछ ऐसा ही महसूस होता होगा तुम्हे
नहीं पहुँच पाउँगा तुम्हारे पास मैं
जानता हूँ
फिर भी आ रहा हूँ मैं तुम्हारी ओर
जानता हुआ
कि अन्धा कुआँ है यह कोशिश।

4 comments:

Dhiraj Shah said...

सुन्दर रचना।

हिमांशु । Himanshu said...

कविता कोश पर आपकी उपस्थिति से आश्वस्त हूँ, यह ब्लॉग कविताओं की ऊँचाईयां दिखाएगा ! आता रहूँगा ! आभार ।

रवीन्द्र दास said...

dhanya- dhanya ho gaya main, priy Himanshu!

संजय भास्कर said...

बहुत खूब लिखा है जी