Thursday, April 8, 2010

चोर..... चोर.....

चोर.... चोर..... मैं ऐसा चोर
जो चोरी से भी गया, हेरा-फेरी से भी गया ।
मैं कभी जब सोता हूँ
उससे पहले सोचता हूँ कि सोने से कुछ नुकसान तो नहीं होगा
सोच की गहराई कब नींद में बदल जाती है
पता नहीं चल पाता
मैं हर मोड़ पर, चाहे रस्ते का हो या जीवन का ,
मैं ठिठक जाता हूँ
मोड़ के सही होने के सवाल पर
और कभी न तो किसी सवाल का
न ही किसी बवाल का
जबाव मिलता है
लेकिन एक मैं हूँ जो छोड़ता ही नहीं सोचना ......
बाढ़ में , बियावान में या रेगिस्तान में
अकेले भटक जाने से बढ़ जाता है खतरा
कभी भटका नहीं
लेकिन कल्पना से गुदगुदा उठता है मन
मैं कवि हूँ न
कभी भी लिख लेता हूँ अननुभूत तथ्य
और निहारता आस-पास की आँखों में
चाहे राजा मरे
या रानी चरित्र च्युत हो जाय
देश तो देश ही रहता है
ढंग से पैदा किया जाय तो
कुकुरमुत्ता हो जाता है मशरूम
चोर हो जाता है गुप्तचर
बशर्ते कि उसे भी मिल जाये सरकारी संरक्षण ।

6 comments:

Suman said...

nice

रवीन्द्र दास said...

thanx. suman.

विजय प्रकाश सिंह said...

kyaa khoob likhaa hai | achchhaa hai |

रवीन्द्र दास said...

vijay prakash ji,
dhanyavad aapka is zarranavazi ke liye aur aapke padharne ke liye bhi.

साहिल said...

बहुत अच्छी कविता तो शायद नहीं कह पाउंगा। माफ करें। वजह भी बता देता हूं... कविता के आरंभ आैर अंत के बीच का संबंध नहीं समझ पा रहा हूं। बियाबान में भटकने के ख़तरे, कवि होने के नाते अननुभूत तथ्य लिख लेने, सोच की गहराई के नींद में बदलने का कुकुरमुत्ते के मशरूम आैर चोर के गुप्तचर हाेने से क्या संबंध है समझ नहीं सका। आैर जहां तक मेरी समझ है सरकारी संरक्षण में घुसपैठिया गुप्तचर हो सकता है। बहरहाल कविता के अंत में जो संदेश है उसे पूरी कविता के साथ जोड़कर कोई सीधा अर्थ नहीं निकाल सका। हो सकता है मेरी समझ का कसूर हो...फिर भी।

रवीन्द्र दास said...

aap ki path ka kusur katai nahi hai, sahil.
lekin ek bat avashya kahna chahunga k path ki thodi bhumika hai jo aapko kavita tak pahunchne se rok raha hai. aap kabil aur zahin pathak hain islie nivedan karta hun k vyakti aur vyastha ke bich ke sambandh me antarvyapt vidambna ko mahsus karne ki zahmat uthaenge to path me kuchh n kuchh antar jarur aayega. baharhal, aapka bahut dhanyavad- yahan aane ka aur kavita ko dhyan se se padhkar us par tippani karne ka dhanyavad.