Thursday, April 15, 2010

लिखूंगा तो रेतों पर ही

लिखूंगा तो रेतों पर ही
चाहे वह मिट जाए पल में
आज अगर मैं जी न सका तो
क्या रखा?
अनदेखे कल में।
तुम हँसते हो या रोता मैं
अपना अपना हँसना रोना
समय गुजरता
साथ सभी ले
तुम्हे याद हो- साथ पढ़ी थी
लिखी हवा पे
कोई इबारत
चला गया था धीर समीरे
याद कई दिन तक आया था
कई तर्क रचकर बैठे थे
जीवन की खुशियाँ थी मन में
तर्क आज जब तुम करते हो
मेरे इस असफल जीवन के
पाते हो कुछ नए ठिकाने
जो न कहीं दर्ज मिला था
मेरे जीवन की पोथी में
लिखूं रेत पर
कोई पढ़े तो वह शाश्वत सा हो जाएगा
वर्ना कई सुनहरे अक्षर
अंधेरों में है, गुमसुम है......
मैं तो निर्जन रेतों पर ही
अपना सब पैगाम लिखूंगा
मिट जाए या रच-बस जाए
नीचे अपना नाम लिखूंगा
लिखूंगा तो रेतों पर ही।

3 comments:

संजय भास्कर said...

मैं तो निर्जन रेतों पर ही
अपना सब पैगाम लिखूंगा
मिट जाए या रच-बस जाए
नीचे अपना नाम लिखूंगा
लिखूंगा तो रेतों पर ही।

इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

वाह!
कभी हमने भी लिखा था..

"इतने घरौदे टूटे कि लहरो से दोस्ती हो गयी,
उसी रेत पर अब एक घर बना रहा हू मै.."

अच्छा attitude है.. पसन्द आया..