Sunday, September 5, 2010

ममता की भाषा

कोई विज्ञापन सिखाता है हमें
ममता की समकालीन भाषा
और जाग पड़ती है हमारी
अलसाई ममता... नए कलेवर और ताजगी के साथ
और हम चल पड़ते हैं खरीदने
वह उत्पाद
जो जरूरी है ममता प्रदर्शित करने के लिए
कोई मुलायम सा पाउडर, या साबुन या शैम्पू
जो भी सिखाता है विज्ञापन
हम मिट्ठू तोते को तरह झट से सीख लेते है
और आसपास , पास पड़ोस को जताते हैं
अपने समय के साथ होने का प्रमाण
कि हम अपने बच्चों से करते हैं
महंगा प्रेम ।

7 comments:

विवेक सिंह said...

मँहगा प्रेम !

वाह ! वाह !

चश्म ए बद्दूर said...

उत्तर आधुनिक दौर में इस मंहगी ममता आैर प्रेम का होना कोई नयी बात नहीं, लेकिन आपके शब्द एक बार फिर अहसास दिलाते हैं कि उत्तर आधुनिक होना हमारी जरूरत नहीं लाचारी बन चुकी है। इस लाचारी के नाम पर पूरा बाज़ार टिका है। एक बेहद प्रभावी रचना के लिए बधाई....

रवीन्द्र दास said...

thank you Vivek Singh to appreciate the poem.
AND special thanks to CHASME BAD DOOR, for appreciating and giving a direction of meaning.
the word is meaningless till a listener does not react. i m really glad to read your comments. thanks again.

Dr. Aparna said...

नयापन और ताजगी लिए हुए आपकी कवितायेँ बहुत सुन्दर बन पड़ी हैं। बधाई।

रवीन्द्र दास said...

Dr. Aparna, i m happy to have your precious comment.you are a new visitor of mine. welcome.
and thanks overall.

राजीव तनेजा said...

बढ़िया कटाक्ष...

रवीन्द्र दास said...

राजीव जी, धन्यवाद ! संक्षेप में अद्भुत कमेंट. वाह.