Thursday, September 8, 2011

और प्यार कोई काम तो है नहीं !

तुम इतनी जल्दी चले गए !

मैं तो नदी किनारे भाग भाग कर

तुम्हारे साथ तितलियाँ पकडना चाह रही थी

रेल की पटरियों पर

चलते चलते

बुनना चाह रही थी कुछ सपने

और चटखारे लेकर कुतरना चाह रही थी

कच्ची इमलियाँ ....

यकीन न हो तो देख लो -

यह नमक मिर्च की पुडिया ...

लेकिन तुम्हें क्या !

जाना था ... सो चले गए !

आज पहली बार पहनी मैंने

धानी घाघरा-चोली ...

सब्ज दुपट्टा बनवाया था

बाबा से जिद करके....

कितना खेल रचकर आई थी

सहेली के बुखार का बहाना करके

वरना माँ कभी आने देती

भरी दोपहरी में...

और तुम इतनी जल्दी चले गए...

मुझे लगता रहा था अबतक

कि तुम्हें प्यार है मुझसे

तभी तो कल्पनाओं में आकर ठहर गए थे

तुम मेरी

और मैं नदी सी

बहती जा रही थी उम्र बिताते हुए

यूँ ही बेवज़ह...

कैसे दिखाऊँ तुम्हें

कि तितलियाँ भी ठहर गईं

सपने भी सहम गए ....

पर तुम तो चले गए...काम से

और प्यार कोई काम तो है नहीं !

3 comments:

राजीव तनेजा said...

विरह को बखूबी दर्शाती सुन्दर रचना

रवीन्द्र दास said...

बहुत सटीक टिप्पणी के लिए शुक्रिया भाई राजीव !!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया लगी आपकी रचना!