Thursday, January 26, 2012

फूलों ने आँखें खोलीं...

कोई नहीं जानता था

उस तिलस्म को

न आगाज़ और न ही अंजाम

तो भी,

कभी न हुई जिनकी मर्जी

कि चखें चाट

या खाएँ गोलगप्पे..

लगती थी अच्छी, बस, उन्हें

हमारी आपकी सोहबत

वे किसी के साथ थे

बात कोई और नहीं

बस होना था किसी का...

वे जंगली थे

नहीं जानते थे भजन करना

नाच कर रिझाना भी नहीं.

* *

उन्हें अपना शरीर सुन्दर लगता

सुन्दरता का बडा चलन था उनमें

सुन्दर बनने के लिए बडी कीमत देते थे

हमें फ़क्र था

जो मर्जी से सुन्दर और बदसूरत कहते थे.

दुनिया बेखटक चलती जा रही थी

हम अतृप्त थे फिर भी..

* *

हमने सुन्दरता में ताकत देखी

ताकत का इस्तेमाल किया

शुरू शुरू में .. हमें अच्छा लगा

उन्हें बुरा

वे अपनी सुन्दरता को फूल समझते थे

हमने उन फूलों से

पडोसियों को भरमाया जरूर

लेकिन फूलों ने आँखें खोल लीं...

* *

वापस आ गई चेतना

उन्होंने हम से हमारा परिचय पूछा

हैसियत पूछी हमारी

अपने सुन्दर शरीर पर उंगली फिराई

शरीर उन्हें और भी खूबसूरत लगा

खुली आँखों वे निकल पडे

बाज़ार में

* *

शुरू में तो हमें साथ रखा

हमने अपना कद घटाया..

स्वामी से प्रेमी हुए

लेकिन उनके नए अहसास ने

हमें गेट के बाहर किया..

* *

हम गरीब खरीदार

करीद न पाने की हालत में

सांस्कृतिक पतन का नारा दिया..

और इस पर वे मुस्कुराए

संस्कृति का अधिष्ठान बनकर

शाश्वत शक्ति का हमारा सपना टूटा

और हम चिल्लाने लगे-

"बाज़ार... बाज़ार.....

* *

कहना न होगा मित्रो !

तिलस्म टूटता नहीं.. सर चढकर बोलता है

तभी तो तिलस्मी नगीने खुद बताते हैं

अपने भाव !!!

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर!
63वें गणतन्त्रदिवस की शुभकामनाएँ!

Onkar said...

Gahre arth wali kavita