Monday, April 8, 2013

टूटे बिखरे सच को

टूटे बिखरे सच को
जब कोई
पिरोने की कोशिश करता है सपनों से
तो वह संकोच के मारे वीतराग हो जाता है
और दुनिया को बदल देने की ज़िद में
हो जाता है दीवाना
यह सच है समय का
तेरा मेरा या किसी और का नहीं

यह समय, जो दुनिया है
यह दुनिया
जो एक खेल है जहां नाजुक और मासूम होने का
एक व्यवस्थित अर्थ है
अपना निश्चित संदर्भ है
कठोर और अक्लमंद होने का

कोई नकारा छोटा सा वियतनाम
बचा लेता है अपना वज़ूद
और भीमकाय सोवियत संघ हो जाता है खंडित
दुनिया के खेल में जहां कोई
सूत्रधार नहीं, सबकी भूमिका
खुद की तय की हुई होती है

कोई दर्दनाक भूमिका निभाता है
तो कोई शर्मनाक
भलाई या मक्कारी हिस्सा है चरित्र का ही
किसी को न तो शर्म आती है
न किसी को लगता है डर
न आज से
न आने वाले कल से

तो भी, जिसने जितना तोडा है
जितना बिखेरा है
संभालना होगा उसे ही
कोई सिद्धान्त, कोई सपना
तंद्रा तो देगा,
किसी सूरत रिहाई नहीं

2 comments:

Onkar said...

सुन्दर रचना

धीरेन्द्र अस्थाना said...

bahut kuchh kahte huye shbd .