Thursday, October 21, 2010

भक्ति गीत

बंद आँखों में अँधेरा
आँख खोलूँ तो धुंधलका
राह मैं पाऊं भला कैसे, न जानूँ ?

पूछकर देखा, सभी ने
अपने घर का रास्ता मुझको सुझाया
पहुँच भी पाया बमुश्किल
किन्तु कोई आसरा मैंने न पाया
हाय, दुर्दिन के सफ़र
हँस रही है हर नज़र
राह मैं पाऊं भला कैसे, न जानूँ ?

बस घडी भर साँस लेने
बैठ जाऊं जो कहीं, सब पूछते हैं
किस तरह दिन कट रहे हैं
वे सावली जानते सब बूझते हैं
हार का अहसास भूला
जीत का पाया न कतरा
राह मैं पाऊं भला कैसे, न जानूँ ?

जब कभी बेआस होकर
आँख ऊपर की, घनेरे मेघ छाये
इस चतुर्दिक मौन में
हो प्रकट ईश्वर, कोई रास्ता सुझाये
भक्ति निष्फल हो रही है
शक्ति धूमिल हो रही है
राह मैं पाऊं भला कैसे , न जानूँ ?

1 comment:

अशोक बजाज said...

बहुत अच्छा पोस्ट !

ग्राम-चौपाल में पढ़ें...........

"अनाड़ी ब्लोगर का शतकीय पोस्ट" http://www.ashokbajaj.com/