Thursday, April 14, 2011

चलना कोई महान काम नहीं है

चले थे..

इसलिए नहीं कि चलना कोई बड़ा या महान काम है

इसलिए क्योंकि चलना था..

सो चलते रहे... चलते रहे..

अभी भी चले जा रहे.

कभी पैरों की ठोकरों से नदी फूट पड़ी

कभी हाथों की हरकत से बादल घिर आये

तो कभी सांसों की खुशबू से खिल गए फूल ....

हम चलते रहे .... चलते रहे...

क्योंकि चलना था...

सभ्यता के चितेरों ने बनाए मेरे तरह तरह के चित्र ...

जिनमें अक्सर बेडौल और बदसूरत चेहरा ही उभरा

मैं अक्सर ऐतराज में बुदबुदाया ...

किसी चितेरे ने ठहरकर न सुना मेरे ऐतराज को...

चूँकि मुझे चलना था ..

सो इसके बावजूद चलता रहा ...

चल रहा हूँ आज भी...

अभी भी...

अपने बदसूरत और बेडौल चेहरों के साथ....

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सशक्त रचना!

रवीन्द्र दास said...

रचना को सशक्त माना .. मेरा हौसला बढ़ाया .. इसके लिए धन्यवाद.