Thursday, December 1, 2011

मेरी पत्नी है ... कोई डायरी का पन्ना नहीं

जहाँ से होकर गुजराती है
मेरी मुश्किलें .... अफसोस .... यातनाएं
जिसके आने और जाने से
संवरता और बिगड़ता है मेरा वजूद
अँधेरे में भी
मेरे अहसास को मिलता है आइना
जो मेरी जीत का स्वीकार
और हार का नकार ......
कोई डायरी का पन्ना नहीं ... मेरी पत्नी है
इसलिए तय है की स्त्री है ... शारीर और मनोविज्ञान से
कुछ ही दिनों बाद से
जब हम मानने लगे थे कि हमारा साथ है जीवन भर का
हमने बनाई आदत एक दूसरे की
एक जरुरी काम की मानिंद
एक दूसरे को जिलाने की कोशिश करने लगे ...
चूँकि नहीं थे बहुत अमीर हम
शायद इसीलिए पाने लगे राहत एक दूसरे की गंध में
देखने लगे सपने एक दूसरे की आँखों में
जानने लगे सच एक दूसरे के अहसास में ....
इन्हीं अहसासों में मुश्किलें हैं...अफ़सोस हैं.... यातनाएं हैं....
और इन्हीं में है कहीं मेरा वजूद
इसी अनचीन्हे वजूद को
मेरी पत्नी ने दिया है एक सांचा
इसलिए नहीं कि वह स्त्री है
बल्कि इसलिए कि हम
एक दूसरे की आदत डालने में सफल हो चुके हैं.....

1 comment:

ok said...

Bahut sundar rachna