Sunday, January 22, 2012

अब लोगों ने आइने का इस्तेमाल कम कर दिया है

अब लोगों ने आइने का इस्तेमाल कम कर दिया है
यूँ कि, हर काम करवा लिया जाता है
भाडे के लोगों से...
तो लोक लाज का सवाल ही कहाँ है !

आप बैठे हैं कहने को तैयार
कि अकविता है यह
तो मैं कहूँगा,
आपके समय से इसी की जुगलबन्दी है...
जो लोग बँट जाते हैं-
विकास के नाम पर...
न्याय वाचाल है.. , घिघिया रही हैं परंपराएँ..
टीवी चैनलों की धारावाहिकों में
सौन्दर्य कर रहा है कैट-वाक
और यहाँ आप हैं
जो उधेड रहे हैं बखिया कविताओं की
सूरज की होगी कोई बेबसी
कि बदल नहीं रहा रास्ता
इसी विश्वास के साथ बाप करता है ऐय्याशी
और बेटी हो जाती है देह-कर्मियों की एक्टिविस्ट...
अव्वल है दोनों, अपने अपने मोर्चे पर
एक पुरस्कार देता है.. दूसरा लेता है
दोनों मंच पर मुस्कुराते हुए फोटो उतरवाते हैं
शीशा नहीं देखता है कोई भी।

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर उनको शत शत नमन!