Tuesday, March 20, 2012

तो हम जरूर मुस्कुराते

जो मिल जाता तुम्हारे
सच से मेरा भी
सच
जो मिल जाती तुम्हारी
दुनिया से
दुनिया मेरी भी
तो हम जरूर मुस्कुराते
साथ साथ
लेकिन तुमने पा लिया है
एक चराग ... नई रौशनी निकलती है
जिससे
और दिखता है सिर्फ़
तुम्हें
तुम्हारा सच
जिसे तुमने हर बार पुकारा
आज़ादी कहकर
और तुम्हारे खैर-ख्वाह
भिडते रहे मुझसे ख्वामख्वाह ..
देखो ... जरा गौर से
कितना बदसूरत हो गया है
समुन्दर का वह किनारा
जहाँ से तुमने उखाड फेका है
वह लहलहाता सा पौधा ...
और नाम दिया मुक्ति ..
सो मौन ही रहना पडा मुझे ...

1 comment:

Reena Babbar said...

aaj ke zamaane mein aurat bhi carrier oriented ho gayi hai, vo bhi aage badhna chah rahi hai aur uski bhi apni mahatvakaankshaayein hain, jisey poora karne ki hod mein ussey un rishton ki undekhi ho rahi hai, jo uske sabse apne hain, bahut sundar dhang se aapne unka dard bayaan kiya hai jo us rishte ke peeche chootne ki peeda ko seh rahe hain