Saturday, November 3, 2012

बोलने का तरीका



जागता हूँ हर सुबह
इस डर के साथ,
कि कहीं भूल न गया होऊँ
बोलना
हालाँकि जानता हूँ मैं
मेरे नहीं बोलने से
यहाँ तक कि. नहीं होने से भी
नहीं पडता है कोई फ़र्क दुनिया को
जबकि .. मैं एक व्यक्ति
और समय व्यक्तिवादी
तो भी,
नहीं रुकती है दुनिया की गति


कुछ लोग मुझे पहचानते है
अच्छा लगता है मुझे
तब क्या होता
जब मैं
और वे कुछ लोग न होते
तो किसी और को
कुछ और लोग पहचानते ..
मैंने पाया, बोलना
मैंने पाया, समझना
मैंने पाया
अपने को आकस्मिक .. खूबसूरत फूल की तरह
जिससे
न तो कोई हतप्रभ है
न खिन्न
कहानी बचपन की कि राजा हो या सूअर
दोनों बचाना चाहते हैं अपने को
ऐसे ही मैं भी .. ?

बीत गए सालो साल
बना रहा डर
छूटा नहीं बोलना
सीखता रहा ..
नई जुबानें .. तहजीब


सुसभ्य नागरिक की तरह
हो जाता हूँ शामिल किसी हुजूम में
घुलकर किसी क्लास में
हो जाता हूँ क्लासीफ़ायड
मैं एक व्यक्ति
और समय व्यक्तिवादी
नहीं होती है जगह खाली
सिर्फ़ व्यक्ति के न होने से
जहाँ ..
कुछ धार्मिक है
कुछ संप्रदायवादी
कुछ स्त्री हैं तो कुछ स्त्रीवादी
यानी ..
होना एक बात है
होने की बात करना .. एक और बात

मैं
होना भी चाहता हूँ
होने की बात भी करना चाहता
लेकिन त्रस्त हूँ
बोलना भूलने के डर से
बोलता हूँ सुबह जगकर
हर रोज़
जो कल तक सीखा था

बुदबुदाता हूँ हर सुबह
'समय के साथ मैं भी'
किसी के अचरज से देखने को
वहीं छोड
समय की प्रगति जानने को
पढता हूँ दस्तावेज़
समय के
देखता हूँ कारनामे
ढाल कर अपनी बोली में
सो जाता हूँ
रातों को .. वैसे ही
जैसे व्यक्तिवादी समय में व्यक्ति सोता है
और सुबह याद करता हूँ
बोलना
डरते हुए

और इस तरह टूटी नहीं
मेरी बेवकूफ़ खुशी
सभ्यताओं और संस्कृतियों के बाडे में
हिरण के नादान बच्चे सी
फुदकती
फिर भी बना रहा डर
कि कहीं भूल न जाऊँ बोलना
भूला नहीं आज तक
तो भी, नहीं होता यकीन
कि हमेशा याद रहेगा बोलने का तरीका
[अक्षरपर्व, मार्च, 2006]

2 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

चुप रहने से बढ़ि‍या बोलने का सलीका कुछ भी नहीं

Onkar said...

सुन्दर अभिव्यक्ति