Monday, February 18, 2013

अब नहीं लिखे जाते हैं गीत



अब नहीं लिखे जाते हैं गीत
वसंत के या सावन के
अखबार के पन्ने
और रोज़नामचे की तकरीर
आलू भी महंगा है
केला भी महंगा है
फिर भी कालेज में रैगिंग
और दिन दहाडे रेप
अविश्वास करने का मन भी नहीं करता

उत्तेजना में भी
कालेज के पन्नों में
या सुन्दर सी लेडी टीचर में
मादकता नहीं दिखती
बडी तमन्नाओं के साथ जवान हुआ था
बूढे हो रहे माँ बाप
जवान क्या बच्चा कहते हैं
हलाहल पी गए शिव
बस यही सोचना है शेष
कि बडा मजा आया होगा

कौफ़ी होम में
शाम को
कम ही खूबसूरत जोडे  दिखते हैं
प्रेम करना अधिक जरूरी है
पाठशाला खोलने की सामाजिक योजना से
अलग अलग देखो
या एक साथ
सचमुच बदरंग है दुनिया
देसी हो या अंग्रेज़ी
आठ गुना पानी मिलाकर
बच्चे और बूढे बसर करते हैं
मर भी जाते हैं कई बार
महापुरुष
या एमेनेस्टी को मनमानी का मसाला देकर

मैं तो जानता ही हूँ
शायद आप भी जानते होंगे बैजू हलवाई को
ट्रक से कुचलकर
मर गया एक बेटा
तीन लाख का हर्ज़ाना मिला
मुस्तैद होने पर
और बन गई बाकी बेटों की जिन्दगी
आज तक नहीं भूला बैजू
अपने 'शहीद' बेटे को

बायाँ या दायाँ
मेरा और आपका सनतन अवलम्ब
नैतिकता
बनाया बिगडा बनाया बिगाडा
तुमने .. मैंने
विरोध करके, प्रगति के लिए
गोया नर मादा की पहचान के लिए
धोती उतरवा कर हिजडे बनाते दस्तावेज़
और अलौट करता है औकात
तौल तौल कर
कोई सी है, कोई टी है तो कोई एफ़ है
और जो जीग्रुप का है
वह  घटाल-खाते में जाता है

जो लिखता है
वह सोचता नहीं
जो सोचेगा तो खाएगा क्या
जब चौराहे पर खडा सिपाही
पूछता है कैसे हो रमजानी .. मजे तो हैं
बेचारा थूके या चाटे
भाग जाता है
बोगस करो या गैर हाजिर

किसी भी कोश में नहीं है परिभाषा साँच की
लेकिन घोडा या गदहा
सिर्फ़ मालिक के नहीं .. खुद के भी हैं
क्षुधा, मैथुन और मृत्यु से
मज़ा आने की तालीम है चैन
और चैन की तालीम है जनवाद
फ़कत महसूस करो, पूछो मत
अजी छोडिए
मेरी तमन्नाएँ जाएँ तेल बेचने
मैं तो सोचता हूँ कैसे लिखूँ गीत
सरकार के या बाज़ार के !   

6 comments:

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (20-02-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
सूचनार्थ |

Kalipad "Prasad" said...


सांस्कृतिक संक्रामक स्थिति की सुन्दर प्रस्तुति
latestpost पिंजड़े की पंछी

दिनेश पारीक said...

वहा वहा क्या बात है मन की आवाज को शब्द दे दिए आपने


मेरी नई रचना

प्रेमविरह

एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

रविकर said...


झिंझोडती हुई प्रस्तुति -
दर्शन, मजबूत कथ्य और शिल्प में -
आभार आपका

बुद्धि विकल काया सचल, आस ढूँढ़ता पास |
मृत्यु क्षुधा-मैथुन सरिस, गुमते होश हवास |
गुमते होश हवास, नाश कर जाय विकलता |
किन्तु नहीं एहसास, हाथ मन मानव मलता |
महंगा है बाजार, मिले हर्जाना मरकर |
धन्य धन्य सरकार, मरे मेले में रविकर ||

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

सदा said...

वाह ...बेहतरीन