Thursday, February 14, 2013

आंसू के नमक का स्वाद



बेस्वाद लगता था उस भेडिये को
लहू और मांस
तब से
जब से उसे आंसुओं के स्वाद का चस्का लगा
अब वह
खाने के मामले में कलचर्ड हो गया
अक्सर कहता है वक्तव्यों में
बिना यातना और आंसू के मौत
तो छल है, धोखा है
पीठ पर वार है
सचमुच अत्याचार है
[ ठठाकर हंसता है लाल दाँत दिखाते हुए]
वे मेरे शत्रु तो नहीं
शिकार है
सोचा तो पाया कि मुझे उनसे प्यार है
नई पीढी के शिक्षित भेडिए
अलग अलग करना जानते है
नमक को , खून, पसीने और आँसू के

आंसू के नमक का स्वाद
भेडिया कई दिनों तक याद रखता है

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (16-02-2013) के चर्चा मंच-1157 (बिना किसी को ख़बर किये) पर भी होगी!
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कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि चर्चा में स्थान पाने वाले ब्लॉगर्स को मैं सूचना क्यों भेजता हूँ कि उनकी प्रविष्टि की चर्चा चर्चा मंच पर है। लेकिन तभी अन्तर्मन से आवाज आती है कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही कर रहा हूँ। क्योंकि इसका एक कारण तो यह है कि इससे लिंक सत्यापित हो जाते हैं और दूसरा कारण यह है कि किसी पत्रिका या साइट पर यदि किसी का लिंक लिया जाता है उसको सूचित करना व्यवस्थापक का कर्तव्य होता है।
सादर...!
बसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ!
सूचनार्थ!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सरिता भाटिया said...

sunder rachna namak ka swaad
http://guzarish6688.blogspot.in/