Wednesday, May 18, 2011

जेठ की दुपहरिया की धूप

जेठ की दुपहरिया की धूप
मुझे अच्छी लगती है
इसलिए नहीं कि लोगों को बुरी लगती है
बल्कि इसलिए कि तुम्हारा चेहरा
तमतमाया और लाल होते हुए भी
शरमाता रहता है 
फटकार के बाद नहीं देख पाता हूँ
सीधी नजर से
शायद सुन्दर चीजें नहीं सोचती हैं अपने लिए
अब संशय नहीं रहा उपेक्षा के लिए
लेकिन यह ओलम्पिक की दौड़ तो है नहीं
मेरे पतन की कोई जिम्मेवारी तुम्हारी नहीं
हलकी बूंदा-बांदी
या हल्का सा हवा का झोंका
मुझे सुखद लगता है
तुम्हें भी लगता होगा
सुनसान रास्ता
तुम में भय
और मुझमें आशा का संचार करता है
जब भी समाज से निकल कर अपने में आना
इसी रास्ते आना
चोर उचक्के भी पस्त हो गए होते हैं गर्मी से
सफेद धूप
सफेद खेत
नहीं होते निर्जीव हमारे संबंधों की तरह
जाग्रत और उतावले होते हैं
मोड़ पर प्याऊ के पास खड़ी बुढिया
पानी पीकर कुछ और जी लेती है
बिना सोचे कि जीने का क्या प्रयोजन है
नहीं बाज आते है
छोटे छोटे भिखारी बच्चे पैसा मांगने से
जेठ की दुपहरिया मुझे अच्छी लगती है
जब तुम
सहम सहम कर पीछे देखते हुए भागते रहते हो
और मैं
अगले कल की प्रतीक्षा करता रहता हूँ

2 comments:

राजीव तनेजा said...

"मोड़ पर प्याऊ के पास खड़ी बुढिया

पानी पीकर कुछ और जी लेती है

बिना सोचे कि जीने का क्या प्रयोजन है"...
बहुत से लोग यूँ ही जिए चले जा रहे हैं बिना किसी प्रयोजन के...
हाँ!..जब पैदा हुए होंगे तो उनके घरों में ज़रूर आयोजन हुआ होगा...
या फिर शायद मातम :-(

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया रचना!