Friday, September 30, 2011

कैसे ज़िकर करूँ मैं

य' ज़िन्दगी है मेरी किसकी नज़र करूँ मैं ।

मंजिल न हम सफ़र है कैसे सफ़र करूँ मैं ॥

रद्दो-बदल हिफ़ाज़त, खुद की नहीं कभी की ।

बे-आम खासियत है, कैसे गुजर करूँ मैं ॥

जीने की आरज़ू है, औ' ख्वाबो-क्वाहिशें भी ।

खतरे वज़ूद पर हैं, कैसे वसर करूँ मैं ॥

मुझको खुदा से कोई नाराज़गी नहीं है ।

अरबों की भीड है फिर, कैसे असर करूँ मैं ॥

सच पूछिए तो मैं ही खुद से न रूबरू हूँ ।

अपने ये कशमकश फिर कैसे खबर करूँ मैं ॥

तालीम की किताबें बेवक्त बोलती हैं ।

लाचार हैसियत है, कैसे ज़िकर करूँ मैं ॥

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।