Sunday, October 23, 2011

बदल रही है तुम्हारी छवि

बदल रही है तुम्हारी छवि
तुम्हारे बदलते चेहरे के साथ
और यह भी कोई भ्रम नहीं
कि तुम अभी भी मेरे साथ ही चल रहे.
मुझे इस क्या !
किसी भी परिवर्तन से गुरेज नहीं
सारी कवायद तो समय के साथ होने की रही
पर जुबान की जैसे ही बढी ताकत
इन्सान.... जैसे मैं, छोटा ...और छोटा होता गया
प्यार की खामोश दुनिया में
दुःस्वप्न की मानिन्द, शक्ति-विमर्श करता है जब अट्ठाहास
तुम्हारे चेहरे का बदला भाव....
देखा हो कभी शायद, काँपती ज्यों लौ दीये की.
तुम्हारी शरीर से मनुष्य होने की यात्रा का पडाव
आज कहीं फिर से शरीर पर आ ठहरी है
अशरीरी देवता... प्रेतात्माओं की तरह
और मैं अकेले कहीं अर्ध-निद्रा में परिवार परिवार बुदबुदा रहा
कालिख निकल रही दीए की रौशनी से
शायद, बत्ती की रुई में मैल है... जो बदल दो
तो हो जाए फिर से रौशन घर-बार !

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

कल के चर्चा मंच पर, लिंको की है धूम।
अपने चिट्ठे के लिए, उपवन में लो घूम।।
--
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

Rajesh Kumari said...

tel me mail hai......vaah..bahut khoob likha hai nirman se deep jalao to ujala bhi addbhut hoga.happy diwali.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुन्दर रचना प्रस्तुत की आपने...
आपको दीप पर्व की सपरिवार सादर बधाईयाँ....

Onkar said...

सुन्दर रचना