Tuesday, December 4, 2012

जमूरे, मदारी और नीतिग्रंथ


अपने को जमूरा मानने से लगातार इनकार करते रहे
लेकिन उसके मदारी होने पर नहीं हुआ
कभी कोई शक
बेशक उसके पास एक नीतिग्रंथ है जिसे पढकर
कभी वह हमें सत्य समझाता है
कभी प्रेम और कभी भाईचारा
उसी ग्रंथ को पढकर वह मदारी हमें पढाता है
क्रान्ति के पाठ भी

बहुधा हमारे सीखने की ललक की सराहना करता है वह
वही कभी कभी झिडक भी देता है
हमारे प्रमाद पर

देखते देखते बीत गईं सदियाँ सहस्राब्दियाँ
पर वह नीतिग्रंथ
आज भी नया का नया है
वैसा ही जैसा धवल-स्वच्छ वस्त्र है मदारी का

कई बार हममें से कोई
प्रभावित होकर लिखता है कोई अनुच्छेद
अपनी विशेष रुचि लेकर करता है मदारी
उस पर विचार
और बताता है सुधार के रास्ते
स्वीकृति के लोभ में हम
मंत्रमुग्ध से सुधर जाते हैं उसके अनुरूप

कुछ उन्मत्त लोग
हर युग, हर समय में लगाता रहा आरोप
कि बदले गए हैं पृष्ठ ग्रंथ के

हम अपने को जमूरा मानने से बचते रहे
पर वह मदारी तो था ही अपने उस नीतिग्रंथ के साथ
समय समय पर हमने
अपनी अपनी सुविधाओं के अनुरूप
जमूरों की पहचान भी की, अपने को बचाते हुए

2 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

नीति‍ग्रंथ ही है झगड़े की जड़

Onkar said...

सार्थक रचना